जीवन सफर की सहचरी 
"लक्ष्मी" 
के लिए
लक्ष्मी-बसंत देशमुख

मेरे    ही   इस   मन   मंदिर में
जो कल्पना मुकाम करती  है। 
कुछ   लिखने  से पहले  उनको 
मेरी   कलम   सलाम  करती है

सनम्र निवेदन
आप सुधी पाठकों को अपना तृतीय काव्य संग्रह सौंपते हुए यह बता देना लाज़मी समझता हूँ कि मैं किसी मुगालते में नहीं हूं कि मैं बड़ा कवि हूं मैं महसूसता हूँ कि मैंने तो अभी साहित्य में चलना शुरु किया है। आपका भरपूर स्नेह यदि पूर्ववत मिला तो अपनी मंजिल तक पहुँचने का हौसला जुटा सकूँगा ।

उत्तरापेक्षी  
बसन्त  देशमुख 
बसन्त पंचमी  १९९६




कविता एक अन्तर्घटना ही होती है
अंचल के युवा कवियों में बसंत देशमुख का नाम अब गौरव के साथ लिया जाता है। प्रस्तुत संकलन आपका तीसरा काव्य संकलन है। चूंकि आपकी हर कविता किसी न किसी मानवीय स्थिति पर एक प्रतिक्रिया होती है अतएव उसमें मन को बेचैन करने की क्षमता जरुरी है। बसंत देशमुख की कविताओं में यह क्षमता है। दूसरे शब्दों में कहना होगा कि सत्य संपृक्त अनुभूतियां ही इन कविताओं का प्रमुख आधार है। इनमें भावुक मुहावरे बाजी अथवा अप्रासंगिक वायवीयता कहीं भी नहीं है। हर दृष्टि से ये कविताएं सार्थक एवं संगत लगती है।

हो  सकता है  दम  तोड़ा   हो
न्यायालय में किसी सत्य ने
उल्टा  ही  आचरण  किया हो
सत्ता सुख में किसी कथ्य ने ।

मनुष्य ने कभी अपने लिये एक व्यवस्था का निर्माण किया था। आज उस व्यवस्था के अनेक घिनौने और दुखद रूप दिखाई देते हैं। वह तो मनुष्य को ही निरन्तर निगलती जा रही है। उसने व्यक्ति को सचमुच निरीह और बौना बना दिया है। बसंत देशमुख की ये कविताएं आत्म समर्पण की नहीं, आत्म संघर्ष की कविताएँ है। जो पाठक मन में समकालीन बिखराव के प्रति एक तीखा बोझ उत्पन्न करती है। इसी से इन कविताओं की केन्द्रीय अर्थवत्ता का आभास सहज ही हो जाता है।

अगर   कहीं    है    बाढ़
कहीं पर सूखा   होगा -
हो सकता है आज नगर में
कोई  बच्चा भूखा  होगा

यह सच है कि आम आदमी की तरह आज कवि भी ढेर सारे अन्तर्विरोधों को जीने के लिये बाध्य है। उसकी यंत्रणा का जगत पहले की तरह काल्पनिक नहीं बल्कि एक सुलगता हुआ यथार्थ है। 

मनुष्य जीवन को संपूर्ण रुपेण अब तक भला कौन जान सका है ? यह सच है कि आज भी मनुष्य के अर्न्तमन को जान सकने के प्रयत्न ही चल रहे हैं। कवि का मन तो अत्यन्त संवेदनशील होता है यही कारण है कि किसी कवि की भीतरी दुनिया को जान सकना तो और भी कठिन होता है उसके अंतर्जीवन का मधु छत्ता तो कभी खुल ही नहीं पाता, जबकि कवि अपनी विभिन्न अभिव्यक्तियों के माध्यम से शनैः शनैः उसे खोलता चलता है और कागज पर कविता अंकित होती चलती है।

यदि हम कविता या गीत के साथ आत्मलीन होना चाहते हैं तब तो हमें कवि के जीवन का अतिक्रमण करना ही होगा। ऐसी स्थिति में आज हमारे लिए यह जरुरी हो जाता है कि हम कवि की अपेक्षा उसकी कविता को जानने का प्रयत्न अधिक करें क्योंकि कवि का जीवन तो मात्र परिधि है जबकि कविता को उसके केन्द्र बिन्दु होने का गौरव प्राप्त है। 

आने वाले दिनों में आदमी आज की अपेक्षा बेहतर बने, ऐसी चाह हर रचनाकार की होती है। कवि बसंत देशमुख की भी यही मूल चिन्ता है। एक जगह आपने लिखा है-

चलते चलते गिर  जाना तो बहुत सरल  है।
पर गिर के फिर उठ पाना तो सरल नहीं है।
बहुत सरल है हिम शिखरों पर भी चढ़ जाना
पर  नजरों  में  चढ़ पाना  तो सरल  नहीं है।

अंत में मेरी शुभकामना है कि प्रस्तुत संग्रह सुधी पाठकों के बीच निश्चित रुप से सराहा जाएगा।

नारायण लाल परमार
पीटर कालोनी, टिकरापारा
धमतरी (म.प्र.)
४९३ ७७३









कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें