सौ सूरज लुट गये कहीं पर

कितने कंगन लुटे, माँग
हाय कितनों  की  उजड़ी
कितने हुए यतीम बहन
कितनी भाई से  बिछुड़ी

कितनी आंखों का उजियारा
सीमाओं पर काम आया है
सौ सूरज लुट गये कहीं पर
तब ऐसा प्रभात आया है

इस प्रभात के लिए लड़ी थी
झांसी वाली लक्ष्मी रानी
इस प्रभात के लिए हुआ था
लाल कभी राबी का पानी

इस प्रभात के लिए भगत सिंह
फाँसी   के   फन्दे   पर   झूला
इस प्रभात  के  लिए  हो  गया
था शहीद  वो  अशफाकउल्ला

इस प्रभात की  खातिर  हमने
खोया   है    नेता   सुभाष  को
इस प्रभात की खातिर हमने
खोया चन्द्रशेखर आजाद को

इस प्रभात की खातिर दे दी
मदन  धींगरा  ने   कुरबानी
इस प्रभात की खातिर बागी
खुदीराम  की  हुई   जवानी

नाना, तात्या, तिलक, गोखले
लाल  पाल   का  खून  बहा  है
प्राचीरों में लाल किले की
तभी तिरंगा झूम रहा है

गाँधी नेहरु और पटेल के
चरण चिन्ह मिटने न पाये
पंत, प्रसाद व जयप्रकाश व
मौलाना को भूल न जायें

कितने हैं गुमनाम कि जिनके
इतिहासों में नहीं नाम है
वीर शहीदों की कुरबानी
सदियों तक करती प्रणाम है

आज उठाना शपथ तुम्हें है
लगा माथ पर रक्तिम टीका
बाल न बाँका होने पाये
मेरे देश सोनिल माटी का

आजादी उपहार अनोखा
वीर शहीदों के लोहू का
इससे खेल न पाये कोई
बैल राजनैतिक कोल्हू का

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