सनद रहे सब लिख दिया
शायद तुम्हारे काम आये
एक तो नादान थे हम
और वाणी मूक भी थी
किन्तु कुछ भी कर गुजरते
मन में ऐसी भूख भी थी
मस्तियों में सुबह भूले
बन के बुद्धू शाम आये
जाल फैलाये खड़ा है
हर तरफ शातिर जमाना
छद्म की जादूगरी से
है मुझे तुमको बचाना
सत्य निर्वासित न जाने
लौटकर कब धाम आये
मानवीय संवेदनाएं
किस नदी में बह गयी है
मानवों की रम्य बस्ती
दानवों की रह गयी है
कौन जाने हमसे जादा
वक्त तेरा वाम आये
-- : बसंत देशमुख :--
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