मेरी कलम सलाम लिखती है

जिसके तन  की  गर्मी  पाकर
मेरे   भाव   पिघल   जाते   हैं
जिन  बाहों  का  हार  पहन के
भाव  गीत   में   ढल  जाते  हैं

जिन  नजरों  में   डूबडूब   कर
मेरी कलम कलाम लिखती है।
                    कुछ  लिखने से  पहले  उनको

युग-युग तक मिलते रहने की,
हमसे   पहले    कसमें   खाओ-
उन कसमों को उन कसमों की
सच्ची  सच्ची  कसम दिलाओ

जो   कसमें   ढलने   से   पहले
सुबहों  से  हर  शाम  करती  है।
                    कुछ  लिखने  से  पहले  उनको

जूही  चम्पा  और   चमेली  की
कलियाँ   भी   बिक   जाती   है
पर  जिन   कलियों   के   आगे
ये  दौलत  भी  झुक   जाती  है

जो  बिकने   से   पहले  अपने-
तन का काम तमाम करती है।
                       कुछ लिखने  से  पहले  उनको

मुझको तुमसे  मिली प्रेरणा
मैंने कब इनकार  किया   है
मुझको तुमसे मिली साधना
ये भी तो स्वीकार  किया  है

पर मेरे  ही  मन  मन्दिर  में
जो कल्पना मुकाम करती है
                        कुछ लिखने  से  पहले  उनको




-- : बसंत देशमुख :--

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